Saturday, August 18, 2012

हिंदी सप्ताह की एक छटा त्रिशूर में भी चमकी




19 SEPTEMBER 2011 
♦ नीलांबुज

ब सारा देश प्रायोजित रूप से हिंदी पखवाड़ा मना रहा है, उस समय हम ‘विकल्प’ की तलाश में हैं। जी हां, एक ऐसा मंच है ‘विकल्प’ जो गुटबंदी की गंदगी से परे एक पुरकशिश कोशिश है कुछ हिंदी प्रेमियों की।
फेसबुक पर मित्र बनी डॉ शांति नायर ने सबसे पहले इसके बारे में बताया। एर्नाकुलम जिले में कालड़ी के संस्कृत विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के कुछ उत्साही और समर्पित साथियों ने इस मुहिम को शुरू किया है।
एक खास बात जो मुझे अच्छी लगी – गोपालस्वामी जी ने बताया कि हम लोग हर दो महीने पर किसी पुस्तक पर चर्चा करते हैं। पुस्तक पहले ही तय कर दी जाती है। सारे सदस्य उस किताब को खरीद कर पढ़ते हैं। फिर उस पर चर्चा होती है। अब तक हर विधा की महत्वपूर्ण किताबों पर चर्चा हो चुकी है। इस बार जो पुस्तक चर्चा के लिए चुनी गयी है, वह है – सूरजपाल चौहान जी की ‘तिरस्कृत’।
केरल के एक छोटे से शहर त्रिशूर में यह ‘विकल्प’ का छठवां सम्मलेन था। वरिष्ठ व्यंग्यकार गोविंद शेनॉय (85 वर्ष) मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से एक प्रेरणा रहे। उनका उत्साही व्यक्तित्व ‘काल से होड़’ लेता दिखा।
डॉ गोपालस्वामी जितने सरल और कर्मठ हैं, उतने ही उदार भी। संस्था के सचिव के रूप में उनसे मिलने से पहले त्रिशूर रेलवे स्टेशन पर ही हम उनसे एक जिम्मेदार आयोजक के रूप में मिले। रात 10:30 पर भी वह हमारा इंतजार करते हुए मिले।
सुबह उन्होंने आयोजन स्थल पर सबसे परिचय करवाया। काफी बड़ी संख्या में बीए, एमए, एमफिल और पीएचडी के विद्यार्थी वहां थे। हिंदी के अध्यापक तो थे ही। कुछ अन्य हिंदी प्रेमी भी थे। यहां तक की बच्‍चे भी थे।
गोष्‍ठी का विषय था – “कविता का वर्तमान”।
डॉ पी रवि ने इसी नाम से एक किताब का संपादन भी किया है, जिसका लोकार्पण गोविंद शेनॉय जी ने किया। ‘जन विकल्प’ नाम की पत्रिका का प्रवेशांक भी जारी किया गया।
बाकी तो वो सब हुआ यहां भी, जो हर जगह होता ही है। उसका उल्लेख नहीं करूंगा।
काफी सारी यादें लेकर हम लोग लौटे हैं वायनाड। अच्छा लग रहा है।