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Thursday, September 13, 2012

हिन्दी नाटक , सिनेमा और समाज



भारतीयता ने कई बार अपने अर्थ को बदला है। आजादी से पहले भारतीयता का अर्थ देशभक्ति से लिया जाता था।  लेकिन विभिन्न कारणों से आजादी के बाद भारतीयता की अभिव्यक्ति दूसरों तरीको से होने लगी। अब भारतीयता फिल्मों में, राष्ट्रीय त्योहारों और खेलों में नजर आने लगी। आजादी के पहले के नाटकों का विषय प्राचीन संस्कृति पर आधारित था। जो हमारी गौरवपूर्ण संस्कृति थी, हमारे इतिहास नायक और नायिकाएं थी उनके माध्यम से देश में पुनर्जागरण लाया  गया। यह कार्य खासतौर पर प्रसाद ने धु्रवस्वामिनी,चन्द्रगुप्त आदि के माध्यम से किया। बीसवीं शताब्दी के दूसरे-तीसरे दशक तक आते आते प्रहसन और व्यंग्य पर आधारित नाटक लिखे जाने लगे। इसमें अंबिकादत्त त्रिपाठी, सीय स्वयंवर, राचरित्र उपाध्याय, देवी द्रौपदी, रामनरेश त्रिपाठी सुभद्रा,गौरीशंकर प्रसाद, बेचनशर्मा उग्र, लक्ष्मीनारायण मिश्र आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने प्रहसन के माध्यम से समाजिक, राजनैतिक, धार्मिक रूढि़यों पर प्रहार किया।
 लेकिन आजादी के बाद विषय बदल गये। भारतीयता की कई विडम्बनाएं सामने आती है जैसे दलित, कामकाजी स्त्रियां बनना, भष्टाचार आदि। इन सभी ने हिंदी समस्त सभी भाषाओं के रंगमंच के विषय को बदलने की राह दिखाई। इन नाटकों को यथार्थमूलक नाटक भी कहा जाता है। मोहन राकेश का ‘आधे-अधूरे’, स्वदेश दीपक का कोर्टमार्शल, मुद्राराक्षस का तिलचट्टा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का बकरी मुख्य नाटक है। इन नाटकों में जहां एक ओर परंपरागत रूढि़वादी मूल्यव्यवस्था का समर्थन करते हैं वहंी दूसरी ओर नयी पीढ़ी उन मूल्यों का विरोध करती भी नजर आती है। परिवार में तनाव इन परिस्थियों में आता है। परिवारों का टूटना इस समय की सबसे बड़ी समस्या है।
भारत आज महानगरीय देश बनता जा रहा है। इस 21वीं शताब्दी में भारत अपनी पहचान खुद खोज रहा है। ऐसे में भारतीयता को अपना अर्थ खोजने में खासा मशक्कत करनी होगी। नाटकों की भूमिका हमेशा ही दोहरी होती है। एक तो साहित्य की तरह यह समाज का दर्पण है और दूसरी ओर मनोरंजन के बदलते स्वरूप में अपनी जगह । मोहन राकेश के बाद कई नाटककारों ने इस क्षेत्र में कार्य किया।
नाटक के क्षेत्र में एक नया प्रयोग देखने को मिल रहा है वह है कहानी का रंगमंच। इसमें समकालीन कहानीकार उदय प्रकाश की कहानियों को शामिल किया जा सकता है। उनकी कई कहानियों को रंगमंच पर उभारा जा रहा है। तिरिछ और मोहनदास। ऐसे ही प्रयोग पहले भी देखे गये है। प्रेमचंद्र, अमरकांत, रेणु और हरिशंकर परसाई की कहानियों का मंचन हो चुका है। इसका कारण है ये कहानियां तमाम ऐसी समस्याएं लेकर आती है जो कि जनता देखना चाहती है या जो इसके करीब है। रंगमंच की ही तरह बड़े सिनेमा के परदो पर भी उपन्यासों पर फिल्म बनी है जिसका चलन इन दिनों भी देखा जा रहा है।

हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेन्दु हरिश्चंद्र से माना जाता है। भारतेन्दु मंडल के नाटककारों ने जनता को जागृत करने के उद्देश्य से नाटकों की रचना की। भारतेन्दु ने पहला आलोचनात्मक निबंध भी नाटक पर ही लिखा। यह बात नाटक की व्यापक स्वीकृति की ओर इशारा करती है। जिसमें उन्होंने उस समय की सामाजिक समस्याओं का उठाया। इसके बाद प्रसाद ने उच्चकोटि के नाटक लिखकर हिंदी नाटक साहित्य को समृद्धि प्रदान की।जार्ज इब्सन आदि पाश्चात्य नाटककारों का प्रभाव इस युग में भारतीय नाटककारों पर पड़ा। नाटक परिवर्तनकारी होता है। समय के साथ उसकी समस्याएं, कहने का ढंग सब कुछ बदलता है। परिस्थि को देखते हुए इसने भी अपना रूप बदला। समकालीन नाटकों में विषय से लेकर कहने का ढ़ंग सब कुछ बदल चुका है। अब कई नाटककार नाटकों की प्रस्तुति में टैक्नाॅलजी का भरपूर प्रयोग करते दिख रहे हैं।

असगर वजाहत का एक नया नाटक आया है गोडसे/गांधी.काॅम। यह हमारे समाजिक और राजनैतिक गांधी की प्रासंगिकता को पुनः खोजने का प्रयास करता है।
इस दिशा में हम स्वदेश दीपक का नाटक कोर्टमार्शल को भी देख सकते हैं। जिसमें जीवन के यथार्थ को दिखाया है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक बकरी भी इस उल्लेखनीय है। इसके साथ धर्मवीर भारती का ‘अंधायुग’ और दुष्यंत कुमार का ‘एक कंठ विषपायी’ यह मिथकों को लेकर लिखे गये नाटक है। इसमे प्राचीन भारतीय संस्कृति से संदर्भ लेकर नयी प्रश्न उठाये गये है। अगर उर्दू नाटक का जिक्र करे तो उसमें जहाक का ‘जिकरा’ को गिना जा सकता है।
रंगमंचकार हमेशा से ही कुछ अच्छा काम करके फिल्मों की ओर जाते रहे हैं और मैं इसे बुरा भी नहीं मानता हूं। अब तो यह अभिनेता टी.वी. सीरियल का रूख भी कर रहे हैं। रंगमंच और सिनेमा  दोनों का उद्देश्य एक ही है मनोरंजन के साथ समाज की कुरीतियों पर प्रहार। अंतर यही है कि नाटक का टेक्नीकल स्वरूप है सिनेमा। दोनों ही कहानी कहते है। दृश्य और श्रव्य माध्यम से। सिनेमा को कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए। समय के बदलते स्वरूप में दोनों अपनी भूमिका निभाते है। कई मामलों में फिल्म का असर और पहुंच नाटकों से ज्यादा है। अगर नुक्कड नाटकों को छोड़ दिया जाये तो आज रंगमंच की पहुंच जनता से काफी दूर हो गयी है। यह एक विशेष वर्ग के लिए ही बनता जा रहा है। और जहां तक नुक्कड़ नाटकों की बात है वह मुख्यतः विचारधारा के प्रचार का एक इंस्टूमेंट यां यू करे राजनैतिक का दिलचस्प औजार बनता जा रहा है। सिनेमा ज्यादा सुलभ है इसकी अपेक्षा नाटक करवाना ज्यादा मुश्किल काम है। थियेटर बहुत बलिदान मांगता है।

Tuesday, July 17, 2012

विकल्प





पेड़ से झूल रही रस्सी का
आप क्या बनाएँगे ?

बच्चों का झूला
या
फाँसी का फंदा ?

Thursday, August 5, 2010

बलिया में पुस्तकालय


लाइब्रेरी यानी पुस्तकालय एक किताबें रखने और पढ़ाने वाली संस्था से कुछ ज्यादा हुआ करती है. यह एक जीवन है और इस जीवन को जीने वाले हैं पुस्तक-प्रेमी लोग. लेकिन आज की चकाचौंध भरी जीवनशैली ने लोगों को खुद से ही काट कर रख दिया है. पूँजीवाद अकेलापन उत्पन्न करता है , ये तो कई विचारक कह गए है पहले ही , लेकिन आज कल तो लोग दूसरों  से नही खुद से पराए हो गए लगते हैं. ऐसे माहौल मे किताबें अगर साथ हों तो सुकून देती हैं. एक कवि ने तो कहा है की अकेलेपन में एक किताब ही सबसे अच्छी दोस्त होती है. तो इस उपभोक्तावादी समय में एक पुस्तकालय का अपना अलग ही महत्व है.

मैं उत्तर प्रदेश के  बलिया जिले का एक विद्यार्थी हूँ. बी ए तक की शिक्षा वहीं से ली  है मैने. बलिया कोई बहुत बडा शहर नही है. शहर की चौहद्दी तो इतनी छोटी है की अगर आप सायकिल से निकालिए तो २० मिनट में शहर का चक्कर लगा कर आ जाएंगे. इसी जिले ने साहित्य को हजारी प्रसाद द्विवेदी, केदारनाथ सिंह और अमरकान्त जैसे आलोचक, कवि और कथाकार दिए. जगदीश'सुन्दर' जैसे गीतकार दिए और राजनीति के कई योद्धा दिए. और उसी बलिया शहर में आज लोगों ने पुस्तकालयों की तरफ से मुह मोड-सा लिया है. यह विडम्बना ही कही जा सकती है. 

 इस शहर में कम से कम दो ऐसे पुस्तकालय हैं जो एक आम पाठक को लाभान्वित कर सकते हैं. दिक्कत ये है कि इन् दोनो पुस्तकालयों का कोई प्रचार तन्त्र नही है. एक तो राजकीय पुस्तकालय है जो चौक में कासिम बाजार के निकट  जी आई सी के गेट से लगा हुआ है. दूसरा भी चौक में ही टाउन हाल में है जिसे हिन्दी प्रचारिणी सभा चलाती है. राजकीय पुस्तकालय सरकारी है तो जाहिर है यहाँ पुस्तकों की संख्या और आगत अधिक है. साहित्य, समाजशास्त्र , राजनीति , इतिहास, विज्ञान , खेल और प्रतियोगी परिक्षाओ के लिए उपयोगी किताबों का यहाँ अच्छा संग्रह है. इसका सदस्यता शुल्क भी महज  ३५० रुपये है. वो भी आजीवन. लेकिन बलिया की युवा पीढी में इसके प्रति उदासीनता है. चन्द बुद्धिजिवियों और कुछ ज्ञान-प्रेमी युवाओं के अलावा यहाँ कोई नही आता. नयी  पीढी जितना ध्यान बाज़रों मे नए तरह के कपडों और जूतों पर देती है उसका एक चौथाई भी इधर नही देती  और तुर्रा ये कि हमें तो पढ्ने की  जगह ही नही मिलती ! मुख्य  बाजार से पुस्तकालय बिल्कुल लगा हुआ है लेकिन कोई भी वहाँ तक जाने कि ज़हमत नही उठाता. कहते हैं कि " हमरा त् कोरसे के कितबिया से फुर्सत नईखे, लाइब्रेरी के जाओ"  (हमें तो कोर्स कि ही किताबें पढ्ने से फुर्सत नही है , अब लाइब्रेरी कौन जाए.) जबकि ऐसे लोग अगर यदा कदा पढ़ते भी दिख जाएँ तो दुहाई है ! 
हजारी प्रसाद द्विवेदी के बलिया मे सारे युवा ऐसे ही नही हैं. कुछ लोग अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल निकाल कर वहाँ चले ही जाते हैं. लेखक ने  एक बार एक दिहाड़ी मजदूर को वहाँ पढ़ते देखा है. दिन में मेहनत करने के बाद शाम को वह अखबार पढ्ने आया करता था. उसका नाम शायद भूल गया हूँ लेकिन ऐसे ही लोग बलिया की  विरासत के सही हकदार हैं. 
पुस्तकालय का भवन है तो छोटा ही लेकिन २० व्यक्तियों के बैठने के  लिए काफी है. प्रकाश की व्यवस्था हालाँकि  बहुत अच्छी नही है. पुस्तकालय के कर्मचारी और अधिकारी भी काफी मदद करते हैं शोधर्थियों और जिज्ञासुओं की. किताबों के रख रखाव की व्यवस्था भी और सुधारी जा सकती है. लेकिन असली ज़रूरत है युवा वर्ग को इस तरफ आकर्षित करने की. 

हिन्दी प्रचारिणी सभा का पुस्तकालय सार्वजनिक तो नही है लेकिन  यहाँ पांडुलिपियों का काफी अच्छा संग्रह है. यहाँ से शोध के लिए किताबें मिल जाती हैं. ज़रुरत है इस सुविधा को हर खासो-आम तक पहुँचाने की.

बलिया रेलवे स्टेशन के पास सरस्वती पुस्तक केंद्र चलाने वाले श्री राजेंद्र प्रसाद इस दिशा में एक अच्छा प्रयास कर रहे हैं. अपनी  दुकान पर आने वाले हर ग्राहक को वो पुस्तकालयों में जाने के लिए प्रेरित करते हैं. यह जानते हुए भी की इस बात का उनके व्यवसाय पर भी असर पड़ सकता है. लेकिन यही तो है बलिया की धरती का असर जो अगर सही ढंग से हो तो श्रीराम वर्मा को "अमरकांत" बना देती है !
इस धरती पर पुस्तकालयों के प्रेमियों की कमी नहीं होनी चाहिए. उम्मीद तो यही है और उम्मीद एक जिंदा शब्द है!
नीलाम्बुज सिंह.
भारतीय भाषा केंद्र 
जे एन यू , नयी दिल्ली 
मोबाईल - 09968519160

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Monday, April 5, 2010

ऐसे बोर्ड


जिस जगह मैं रह्ता हूँ वो कोई आतंकवादी जगह नही है. लेकिन प्रशासन को बच्चों पर भरोसा नही. एक तरफ सरकार उन्नत भविष्य और बाल सुधार की बात करती है तो दूसरी तरफ ऐसे बोर्ड लगाए जा रहे हैं. ये बकवास है. बच्चों के ठेंगे से !

सख्त मनाही खेलने पर है , फूल तोड्ने पर नही गोया खेल खेल मे ही बच्चे उद्यान (बगीचे का सरकारी नाम) को तबाह कर रहे हैं! इको फ्रेन्ड्ली भी होता प्रशासन अगर फूल तोड्ने पर सख्त मनाही लगा देता !! इसी उद्यान मे एक जल प्रपात ( झरने का सरकारी नाम ) लगा है जिसमे जल आज तक कभी नही दिखा !

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...