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Sunday, August 3, 2025

सांवली लड़कियां



क्या तुमने देखा है  उषाकाल के आकाश को?
क्या खेतो में पानी पटाने पर मिट्टी का रंग देखा है?
शतरंज की मुहरें भी जहां पा जाती हैं बराबरी का हक़  
उस जम्बूद्वीप भारत में क्या तुमने
 किसी साँवली लड़की को 
देखा है कभी गौर से ?

उन्हें काजल की तरह आँखों में बसाया नहीं गया
कलंक की तरह ढोया गया 
शर्म की तरह ढाँपा गया 
बुरी नीयत की तरह छिपाया गया

उन्हें फेयरनेस क्रीम से लेकर 
सीमेंट की बोरी तक 
बेचा गया
काला सोना बताकर 
लूटा गया।

दीपशिखा नहीं 
उसकी कालिख समझा गया!

उन्हें कूटा गया 
काली मिर्च समझकर
 
उनके चेहरे की किताब पर 
लगाया गया मेकअप का कवर 

साँवली लड़कियां 
उग आती हैं बाजरे की कलगी की तरह 
पक जाती हैं गेंहू की बालियों सी 
छा जाती हैं रात की मानिंद
जल थल आकाश कर देती हैं एक
और अपने आगोश में समेट लेती हैं 
पूरी पृथ्वी को. 

उन्हें खोजना हो तो 
विज्ञापनों में नहीं 
देखना किसी लाइब्रेरी की चौखट पर 
या धान के खेत में बुवाई करते हुए 
या रुपहले पर्दों के पीछे 
नेपथ्य में । 

उन्हें ढूंढों 
उन कहानियों और कविताओं में 
जिन्हें कभी पढ़ा या गाया नहीं गया . 

वहांँ मिलेगी तुम्हें वह साँवली लड़की 
जिसकी आँखों में तुम्हें शायद दिखे 
उसके दर्द का वह उद्दाम आवेग 
जिसे उसकी मुस्कराहट के बाँध ने 
थाम रखा है .

Friday, September 14, 2012

सामासिक संस्कृति


सभ्यता दाल-भात है !
स्वाद है संस्कृति?
केवल दाल-भात पेट तो भर देता है
लेकिन कभी-कभी एक अदद हरी मिर्च
(नमक के साथ)
स्वाद बढ़ा देती है
मिर्च कड़वी भी हो सकती है !
( फिर मीठी मिर्ची कभी सुनी भी तो नहीं !)
मिर्च कई तरह से खा सकते हैं –
हो सकता है बने चटनी
लोढ़े-सिलबट्टे पर ।
बन जाएगा आचार , यदि
भर दें उसमें थोड़ा सा मसाला और धन ।
 
यह बात भूख से निकली थी
और भूख संस्कृति नहीं होती
संस्कृति है स्वाद –
स्वाद : मेहनत का , पसीने का , खून का ।
इन्ही को समेट लो कवि !
सामासिक संस्कृति है यही , यही ।
 

Thursday, August 30, 2012

कागज़ी है पैराहन







आज प्यारी डायरी को लिखा फिर से,
खो गयी थी ये , ना जाने क्या हुआ था/
मिस किया था -
ये तो है बिल्कुल ही लाजिम./ आज फिर से 
रंग दिए पन्ने कई/ कुछ मज़ा आया.
मीत से जैसे मिले हों!
इन इशारों में ना जाने बात क्या है,
कागज़ी है पैराहन , अब क्या लिखें हम!!!

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...