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Saturday, May 23, 2020

घातक कथाएँ

प्रकरण: एक

काशी नगरी में एक प्रक्षेपक नामक राजा राज्य करता था। नाम के अनुरूप ही वह प्रक्षेपण में अत्यंत कुशल था। 56 दिशाओं में उसका डंका बजा करता था।
एक बार उसके राज्य पर क्रोणासुर नामक एक अत्यंत बलशाली दैत्य ने हमला किया। यह महर्षि धनेश और अप्सरा सत्तावती की संकर संतान था। इसे असुरराज रोगेन्द्र का वरदान प्राप्त था कि बड़ी मुश्किल से परास्त किया जा सकेगा। भय मानो इसका रथ है, दुष्प्रचार इसका धनुष। असावधानी मानो इसके तीक्ष्ण शर हैं तो शीघ्रता इसकी गदा। इस शक्ति के मद में चूर क्रोणासुर सारी धरित्री पर ऐसे निःशंक विचरण कर रहा है जिस प्रकार कोई एंकर अपने पैनलिस्टों के समक्ष। प्रजा त्राहिमाम कर उठी मानो अपने अश्रु बहाकर पानी का बिल बचाना चाहती हो!
राजा प्रक्षेपक ने अपने आमात्य अति शातिर को बुलाया। सलाह षड्यंत्र होने लगे। अति शातिर ने कहा कि देखिए महाराज, इसे तो वरदान मिला हुआ है। जब चक्रवर्ती सम्राट ट्रम्पेन्द्र और अति कुटिल शिजिनेश आदि इसका कुछ न बिगाड़ सके, तो हम किस खेत की मूली हैं। इसलिए नीति यही कहती है कि धन का प्रबंध करके इसे रोकने का दिखावा किया जाए।
प्रक्षेपक को यह बात पसंद आ गयी। उसने सबसे पहले अपने संचारामात्य को बुलाया और कहा कल वैशाख कृष्ण द्वीतिया को द्वीतीय प्रहर में एक सभा आयोजित करो जिसमें हम प्रजा को 'अंतःकरण का वार्तालाप' इस पवित्र नामवाले संबोधन से संबोधित करेंगे। संचारामात्य ने ऐसा अतिशीघ्र किया क्योंकि जो आमात्य राजा के आदेशपालन में देरी करे उसे उसी प्रकार नष्ट हो जाना होता है जिस प्रकार आत्मश्लाघा बिना अहंकारी जन।
अगले दिन संबोधन में राजा प्रक्षेपक ने प्रजा से कहा कि संकट का समय आन पड़ा है। हम आपकी सुरक्षा करेंगे। घबराएं नहीं। राष्ट्र संकट में है, दान करें। राजा ने एक नया स्थान चुनकर वहां बड़ा सा एक कुँवा खुदवाया। यह इतना गहरा था जितनी सच्ची भक्ति। राजा ने कहा कि जिसे दान करना हो इस कुंए के पास खड़े प्रहरी को दे दे। वो कुवें में डाल देगा। प्रजा में कुछ चारवाकी बुद्धि के लोगों ने पूछा कि महाराज पहले वाला कुँवा क्या हुआ? राजा ने कहा कि उसमें भी स्थान था लेकिन वह राजधानी की पकड़ से दूर है। यह कुँवा सेना द्वारा इस प्रकार सुरक्षित है जैसे चंद्रमा अपनी शीतल किरणों से वियोगी जनों की रक्षा करता है। प्रजा इस उपमा पर बलिहारी हो गयी और दान-पुण्य शुरू हो गया।

प्रकरण : दो

पाठक भूले न होंगे कि प्रक्षेपक ने एक कुँवा खुदवा दिया था। प्रजा अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा इसमें डालती जा रही थी और ये उसी प्रकार भरता जा रहा था जिस प्रकार कोई सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप अफवाहों से भर जाता है। इसकी जानकारियां उसी प्रकार गोपनीय थीं जिस प्रकार शरीफ लोगों के इनबॉक्स।
ऐसा न था कि राजा प्रक्षेपक हाथ पर हाथ धरे बैठा था। उसके तरकश में कुछ कम तीर न थे । उसने महर्षि विश्वबैंकाचार्य की तपस्या कर एक अस्त्र प्राप्त किया उधारास्त्र। महर्षि एडोल्फ़ी से अमोघ अस्त्र झूठास्त्र। गंधर्व आईटी शैल से ऐपास्त्र। लेकिन महर्षि गोएबलेश से मिला दिवयास्त्र सबसे शक्तिशाली था- जुमलास्त्र। नारद से तीनों लोकों में भ्रमण का वरदान भी इसे मिला था लेकिन विगत कुछ मास से यह क्रोणासुर के चक्कर में उसी प्रकार उलझा हुआ था जिस प्रकार टीवी/इंटरनेट के सम्मोहन में आम आदमी उलझा होता है।
क्रोणासुर जब अपना विस्तार करने लगा तो प्रक्षेपक ने प्रजा को एक मंत्र दिया- अधोताल मंत्र। अर्थात घर में बंद रहना। जिस इच्छाशक्ति से सरकारी कर्मचारी लंच के वक़्त काउंटर बंद कर देता है उसी शक्तिशाली इच्छाशक्ति से सबको घरों में बंद रहना था।
पाठक नाम पर न जाएं , मंत्र बहुत सम्मोहनकारी था।
इस बीच प्रक्षेपक के राज्य के श्रमिकों ने अपनी समस्याओं के कारण अप्रवास करना आरंभ किया। क्रोणासुर की अपेक्षा ये बुभुक्षासुर और भेदभवासुर से त्रस्त थे। लेकिन प्रक्षेपक ने इन्हें राजदंड के भय से उसी प्रकार डरा दिया जिस प्रकार आर्ट्स स्ट्रीम ले कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को रिश्तेदार डराते हैं।
नगरी में बहुत से कर्मठ कर्मचारी और नागरिक थे जो वास्तव में इस क्रोणासुर के मायावी प्रहारों को अब तक अपनी वीरता से उसी प्रकार रोके हुए थे जिस प्रकार कोई बॉस अपने जूनियर का इंक्रीमेंट रोकता है।
लेकिन इनके पास अस्त्र शस्त्रों की मात्रा कम थी। प्रक्षेपक ने प्रजा को अपने अंतःकरण की वार्ता के दौरान कुछ तंत्र भी दिए चूंकि मंत्र के साथ कुछ तंत्र भी आवश्यक थे। ध्वनिविस्तार, अग्निलीक और पुष्पांजलि तंत्रों का आह्वान हुआ। प्रक्षेपक ने बताया कि इससे सुरक्षाधिकारियों का मनोबल उसी प्रकार बढ़ेगा जिस प्रकार अज्ञान की हवा से मूर्खता की आग बढ़ती है।
महामुनि हू का अनुमान था कि क्रोणासुर उन्हें पहले खायेगा जो घर के बाहर जाएंगे। लेकिन क्रोणासुर कुछ चमनचम्पक तो था नहीं। यह इच्छाधारी था। इसने मीडिया के सशक्त माध्यमों की खबरों का रूप धारण कर लिया। अब घर के अंदर भी इसने दहशत फैला दी मानो अपनी विजय की दुंदुभी बजा रहा हो!

Saturday, August 18, 2012

अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!


अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!

2 NOVEMBER 2011 5 COMMENTS
♦ नीलांबुज

बैंगलोर का एक चेहरा यह भी है…
जब हम स्काउट कैंप, बंगलौर गये थे ट्रेनिंग के लिए, तो दस दिन की ट्रेनिंग में एक दिन दशहरे के नाम पर बाहर छोड़ा गया, शहर घूमने के लिए। सबसे कहा गया कि यात्रा का विवरण लिख कर लाना है। मेरे अंदर खलबली हुई और जो बाहर आया वो ये था…
ल हम लोग दशहरे वाले दिन बंगलौर घूमने निकले। मैं दोस्तों से थोड़ा पीछे रह गया तस्वीरें लेने के चक्कर में। तभी मुझे बंगलौर आता दिखाई दिया। गंदे-स्वच्छ कपड़ों की मिली-जुली पोशाक में। उदास, हताश, परेशान। मैंने पूछ – “क्या हुआ बंधु, राजधानी होकर भी खस्ता हाल? केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाते हो क्या?”
वो बोला, “नहीं, अब इतना भी बुरा हाल नहीं है। लेकिन अच्छा भी नहीं है। लोग समझते हैं, मैं राजधानी हूं। ऐश-ओ-आराम से रह रहा होऊंगा। लेकिन मुझ पर जो बीतती है, मैं ही जानता हूं। हर रोज मेरे सीने पर सैकड़ों नयी गाड़ियां दौड़ा दी जाती हैं। माल, सड़क, कालोनी बनाने के बहाने मेरी हरियाली को नष्ट किया जा रहा है। ये जो मेरे साफ कपड़े हैं, वो तो मेरा वह हिस्सा है, जिसे मीडिया हमेशा दिखाता है। मेरा असली वेश तो मेरे फटे-पुराने कपड़े यानी वो गंदी बस्तियां हैं, जिनको कभी प्रगति की हवा भी नहीं लगी। रोज बेदखल हो रहे हैं ऐसे लोग मेनस्ट्रीम से। मेरे कुछ भाई-बहनों का हाल तो मुझसे भी बुरा है। कल दिल्ली बहन ने फोन किया था। वो भी कोमनवेल्थ के बाद सुंदरता की उम्मीद में थी, लेकिन क्या हुआ? आजकल मुझे भी मेट्रो नाम का झुनझुना देने की तैयारी है। हर जगह जो गड्ढे देख रहे हो, उसी का परिणाम है। चेन्नई-मुंबई बहन और कोलकाता भाई भी इन्‍हीं दिक्कतों से परेशान है। अहमदाबाद सर ने भी कुछ ऐसी ही बात ईमेल से भेजी थी।”
मैं हतप्रभ था! मैंने ऐसे ही कहा, “चलो बंगलौर भाई, चाय पीते हैं…”
बंगलौर ने कहा, “नहीं। चाय पीने की मुझे आदत नहीं है। पेट्रोल और डीजल का धुआं ही मेरा कलेवा है। कूड़े का लंच कर लेता हूं और डिनर भी वही।”
मुझे देर हो रही थी। सोचा कहां फस गया। इसकी तस्वीर उतार लूं क्या? शायद किसी एक्जिबिशन में पुरस्कार ही मिल जाए लेकिन ऐन उसी वक्‍त पर मेरे मोबाइल की बैटरी ने साथ छोड़ दिया।
बंगलौर ने आगे कहा, “नेताओं, मंत्रियों, अफसरों और टूरिस्टों को दिखाने के लिए मुझे सज-संवर कर रहना पड़ता है, वरना हालत बड़ी खराब है भाई।”
तभी एक लाल बत्ती वाली गाड़ी आती दिखी। बंगलौर ने अपनी कमीज का साफ-सुथरा वाला हिस्सा गाड़ी की तरफ कर दिया। मुझे लगा जैसे कह रहा हो, “अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!”

मोहल्ला लाइव पर यहाँ पढ़ें। 
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Thursday, August 2, 2012

अंतिम पंक्ति का शीर्षक




तर्जनी , मध्यमा, अनामिका
और यहाँ तक कि कनिष्ठा भी
पा जाती हैं मुझ से ज्यादा इज्ज़त
लेकिन द्रोणाचार्यों  के बीच तो
मैं ही लोकप्रिय हूँ.
मैं ओ के  हूँ
मैं चीयर्स हूँ
मैं शेम हूँ
मैं लिफ्ट हूँ , हूट हूँ
मैं लाइक और डिसलाइक का फ्रेम हूँ
और तो और मैं कोका  कोला का
प्रसिद्ध ब्रांड हूँ
मैं अपने आप में अनूठा हूँ
मैं अंगूठा हूँ

Tuesday, July 17, 2012

विकल्प





पेड़ से झूल रही रस्सी का
आप क्या बनाएँगे ?

बच्चों का झूला
या
फाँसी का फंदा ?

रासायनिक परिवर्तन


जब पहली बार
बैठा था वो 
'पिज्जा हट' में 
तो उसे याद आई थी 
चूल्हे की अधजली रोटी,

याद आई थी उसे 
अपनी टपकती हुई झोपडी
जब लिफ्ट से उसने 
पच्चीसवें माले पर कदम रखा था,

बूढ़े बॉस के चेहरे की 
लालिमा की तुलना
उसने जवान भाई के
मुरझाये हुए चेहरे से की थी,

शहर की चमचमाती सड़कों में 
उसे रह रह कर 
गाँव की गड्ढे वाली कच्ची सड़क
याद आई थी,

उसे जब पहली बार मिला 
कॉर्पोरेट कंपनी से
'पेमेंट' का चेक
तब उसे कुछ याद नहीं रहा...

अब वो खुश है !


Saturday, July 7, 2012

लापता




लापता 
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कुछ पता नहीं चलता 
शम्भूक के कटे हुए सिर का 
छींटे तो पड़े होंगे रक्त के !
कहाँ हैं वो ?
क्या धो दिया गया उन्हें सोमरस से ?
या यज्ञ की वेदी के नीचे दबा दिया गया ?

क्या हुआ शबरी का
जूठन खिलाने के बाद ?
क्या राम ने दे दी उसे
वृद्धावस्था पेंशन ?
कहाँ दबी होगी उसकी फ़ाइल ?

और तो और
ना जाने कहाँ है
एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा भी ,
नहीं दीखता 'गुरु द्रोणाचार्य' वाले
मेट्रो स्टेशन पर भी
या द्रोणाचार्य की किसी तस्वीर में ?

कहाँ गए ऐसे लोग ?
कहाँ गयी उनकी स्मृतियाँ ?

ठहरो !
धरती हिल रही है
और
पाताल तोड़ कर कोई
निकल रहा है बाहर !!!

Monday, July 11, 2011

खुद से अपने ही राज़दार हुए

खुद से अपने ही राज़दार हुए
इस तरह हम भी समझदार हुए 

सच कहा तो कोई नहीं माना
झूठ बोला सभी गुलज़ार हुए 

बज़्म में खूब वाह वाह मिली 
अपनी नज़रों में शर्मसार हुए--- नीलाम्बुज 

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Wednesday, April 7, 2010

सानिया शोएब

सानिया शोएब की शादी की खबर मीडिया के लिए दुधारू गाय बन कर आई है.  बाबाओं और भूतों के अलावा सेलिब्रेटीस ही सबसे ज्यादा बिकने वाली खबर होते हैं. फिर अगर बात भारत पकिस्तान के सितारों की हो तो मसाले की कमी ही क्या है!  देशभक्ति का तड़का भी लगाया जा सकता है बड़ी आसानी से! पाक मीडिया इस को पकिस्तान की जीत बता रहा है तो भारतीय मीडिया ( खासकर इलेक्ट्रोनिक) इसमें भारत की शिकस्त दिखला रहा है! मुसलामानों को भारत पर बोझ मानने वालों के हाथ तो जैसे बटेर लग गई है . जिस देश का आम मुसलमान हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा जाता हो वहां सानिया को गद्दार कहने वालों पर आश्चर्य कैसा? 
     जब सानिया से स्पष्ट रूप से यह कह दिया है कि शादी के बाद भी  वो भारत के लिए ही खेलेंगी और व्यक्तिगत तौर पर अपने पति का समर्थन करेंगी , तो इतना हो हल्ला क्यों मचाया जा रहा है?   जयशंकर प्रसाद की एक कहानी है "पुरस्कार". इसकी नायिका अपने देशप्रेम के लिए अपने प्रेमी का बलिदान करती है और अपने  व्यक्तिगत प्रेम के लिए खुद उसके साथ सज़ा पाकर उसका साथ भी देती है. ज़ाहिर है यह कहानी उन लोगों ने नहीं पढ़ी होगी जो सानिया का अंध विरोध कर रहे हैं.  अगर स्थिति इसके उलट होती यानी लड़की पाकिस्तान की और क्रिकेटर भारत का होता तो भी मीडिया ऐसी ही बेवकूफाना  हरकतें करता जैसी वो अब कर रहा है. हाँ , तब "देशभक्त" भारतीयों की कुंठा ज़रूर शांत हुई होती!  सबको सन्मति दे ---- संविधान !

Thursday, September 24, 2009

दुविधा




एक दिन सांप और बिच्छू दोनों लड़े थे
कौन है बड़ा इस बात पर अडे थे
पहले बिच्छू ने अपनी दलील सुनाई
डंक की विशेषता ऐसे बताई---
"मार कर के चला आता और दीखता भी नहीं हूँ
काम कर के चला आता और पिटता भी नहीं हूँ
हैं मानते लोग रहते न पड़े पाला मेरा
मैं ही हूँ श्रेष्ठ, भारी  है पाला मेरा"

सांप ने बिच्छू को बड़े जोर से फटकारा
खोल कर के फन बड़ी जोर से फुफकारा
"भाग ऐ तुच्छ तेरी औकात क्या है?
मुझ विषधर के सामने बिसात क्या है?
कीडे मकोडों में तुझे गिनते सभी हैं
क्या तेरी पूजा वे करते कभी हैं?
मेरे पुरखों का राज चहुँ ओर था
लोग कहते हैं उनका 'डायनों में शोर' था
इसलिए बंद कर अपनी व्यर्थ बात
मैं श्रेष्ठ, मैं कुलीन, मैं अभिजात"

इतने में नेपथ्य से एक सज्जन आये
सांप और बिच्छू बड़े हर्षाये
"कृपया दूर करें हमारी परेशानी
आप हैं नेता बड़े ग्यानी"

यह सुन कर नेता जी खिल पड़े
दिल उछला बल्लियों
होंठ उनके हिल पड़े---
"मैं तुम दोनों को देर से सुन रहा था
निर्णय का ताना बना बुन रहा था

(बिच्छू से )--- अरे ओ डंक वाले सुन बड़ा इतरा रहा है!
इंच भर की पूंछ क्या दिखला रहा है?
बलशालियों की इज्ज़त मिटटी में मिली है
तू क्या! कितनी यहाँ पूछें जली हैं

(सांप से)-- तू भी न ज्यादा फन दिखा, न फुफकार
लाठी न टूटे , तू मरे ऐसी हमारी मार

तुम्ही दोनों ही नहीं मैं भी यहाँ हूँ
अब तुम्हे बतलाऊंगा की मैं कहाँ हूँ

तुम हो विषैले ठीक है यह बात
पर मैं हूँ मानव उस पे नेता जात
तुम अगर काटो तो बच सकते हैं लोग
चिकित्सा से दूर हो सकते हैं रोग
किन्तु ये नज़रें जहाँ टेढी हुई हैं
शिखाएं भी सिमट कर एडी हुई हैं
क्या तैमूर क्या चंगेज  थे खूंखार
तूफ़ान से भी तेज़ मेरी जातियों के वार
अब कौन किससे है बड़ा ऐ मित्र
यह दुविधा है बड़ी विचित्र!"

Tuesday, September 22, 2009

पोस्ट बॉक्स


ये तस्वीर मुखर्जी नगर (दिल्ली) के डाक घर के ठीक सामने वाले पोस्ट बॉक्स की है. क्या आपको इस पर कुछ कहना है?

Monday, September 21, 2009

अथ श्री सादगी पुराण .........


तो जनाब सादगी कि बात चलने लगी.
एक छोटी मूंछो वाले ठिगने आदमी ने कहा---
मैंने हजारों लोगो को बड़ी सादगी से मार डाला था. गैस चैंबर में. गोलियों में कौन खर्च करे.

नौकरशाह से मंत्री बने एक आदमी ने कहा--
हमारा देश तो सादगी पसंद शुरू से है. यहाँ के लोग इतने अमीर हैं कि अपने मवेशियों के लिए भी विमान में अलग सुविधा ले रखी है और कभी कभी उसमे खुद भी सफ़र कर लेते हैं. इसी को कैटल क्लास कह लेते हैं.

एक व्यापारी वर्ग के आदमी ने कहा--
मैं आजकल अपनी पत्नी को सिर्फ २०० करोड़ के ही बंगले गिफ्ट कर रहा हूँ, सादगी का ज़माना है भाई. और मंदी भी चल रही है.

ऐनक पहने और लाठी लिए एक बुजुर्ग कि तस्वीर जो पीछे लटकी हुई थी, अचानक कांपी और नीचे गिर पड़ी..............saadgi puran ..

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...