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Saturday, May 23, 2020

परिंदे जब भी पर तोला करेंगे

परिंदे जब भी पर तोला करेंगे
दरीचे ख़्वाब के खोला करेंगे
अभी पूजा-नमाज़ें कर रहे हैं
ज़हर हम बाद में घोला करेंगे
जो अश्कों को बदल कर खून बेचें
वही पानी को कल 'कोला' करेंगे
अभी गुस्से का धूँआ उठ रहा है
बग़ावत का इसे शोला करेंगे
"हमें हक़ के लिए लड़ना पड़ा था"
नई पीढ़ी से हम बोला करेंगे

बढ़ेगी मुल्क की रफ्तार कब तक

बढ़ेगी मुल्क़ की रफ़्तार कब तक
उठेगी मखमली दीवार कब तक
ग़रीबी कब से रोज़े रख रही है
करेंगे क्यूँ मियाँ इफ़्तार कब तक
सबको यूसुफ़ बना कर छोड़ डाला
चलेंगे इस तरह बाज़ार कब तक
वो थाली, फूल, दीये ठीक है सब
दवा दरपन का पर दीदार कब तक
नहीं बाली, फ़क़त मजदूर हैं हम
करेंगे आप छिप कर वार कब तक
हम तो मिट्टी से कटते जा रहे हैं
रहेगी शायरी में धार कब तक

Monday, October 7, 2013

दिल में खटका सा रहता है


दिल में खटका सा रहता है
शायद ये  सोया  रहता है
उसकी तरफ बड़ी हरियाली
अपनी तरफ सूखा रहता है
नींद बड़ी अच्छी आती है
तकिया बस भीगा रहता है
शायर की तो बात करो मत
कुछ भी बस बकता रहता है
दुनियादारी   कौन   निभाए
वो तो ग़ज़ल कहा करता है
उस डाली को यूँ मत तोड़ो
उस पर एक छत्ता रहता है
इन्सानों की कुछ मत पूछो
ख़ुदा पे भी पहरा रहता है



Sunday, September 30, 2012

ग़ज़ल और बाल साहित्य

ये दो गजलें और नीचे का एक लेख प्रभात खबर में आए थे। आज लगा ही तो दिया यहाँ पर । 


Tuesday, August 30, 2011

गए दिनों की यादें थीं

गए दिनों की यादें थीं
बिन बादल बरसातें थीं

सूना सूना आंगन था
गीली गीली ऑंखें थीं 

एक मेरा दिल तनहा था
तरह तरह की बातें थीं

कभी कभी गठबंधन था
कभी कभी सरकारें थीं

पेट मेरा जब 'फुलफिल' था
चारो   ओर     बहारें    थीं 

पाखंडों का बिल्डर था
मखमल की दीवारें थीं

तेरे पास ज़माना था
मेरे पास किताबें थीं

Monday, July 11, 2011

खुद से अपने ही राज़दार हुए

खुद से अपने ही राज़दार हुए
इस तरह हम भी समझदार हुए 

सच कहा तो कोई नहीं माना
झूठ बोला सभी गुलज़ार हुए 

बज़्म में खूब वाह वाह मिली 
अपनी नज़रों में शर्मसार हुए--- नीलाम्बुज 

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Thursday, July 22, 2010

दिल की बातें करनी है...





'अकबर' सी धुन लायें कहाँ
'नासिर' सा फन पायें कहाँ

दर्द नहीं है इश्क नहीं
इल्म को लेकर जाएँ कहाँ

आम के कितने पेड़ कटे
कोयल पूछे -- गायें कहाँ ?

हंसती हुई इस दुनिया में
दिल को कहो रुलाएं कहाँ

अपना तो बस इक चेहरा
अय्यारी-फन पायें कहाँ

खुसरो, मीर, कबीर, नजीर
अपना दर्द जगाएं कहाँ

दिल की बातें करनी है
बस ये कहो सुनाएँ कहाँ

(तीन जून .... को सद्भावना एक्सप्रेस में दिल्ली से बलिया जाते हुए लिखी थी ये ग़ज़ल )


Monday, July 19, 2010

उंगलियाँ बन गयीं जुबां अब तो...





उंगलियाँ बन गयीं जुबां अब तो ,

बेकली हो चली रवां अब तो 

ये बहारें भी जिनसे रश्क करें 
ऐसी आयी है ये खिज़ां अब तो 

सच कहीं दू......र जा के बैठ गया 
इतने हैं झूठ दर्मयाँ  अब तो 

हाल किससे कहा करे कोई 
पत्ता, बूटा  न गुलिस्ताँ अब तो 

तुम तो जज़्बात ले के बैठ गए 
वक़्त होगा ही रायगाँ अब तो 

बात कुछ कायदे की की जाए 
कर चुके उनको परेशां अब तो 

Tuesday, May 25, 2010







हमारे सफ़र का तो कोई हमसफ़र भी नहीं
 हमारे रास्तों का कोई रहगुज़र भी नहीं /

 हमें तो फ़िक्र है जनाब कल की रोटी की
वो रात हादसे में क्या हुआ खबर भी नहीं/

  भला बाजारों के दस्तूर कैसे सीखें हम
हमारे गाँव के नज़दीक तो शहर भी नहीं/

  न कभी 'धर्म' रहे और न कभी 'जात' रहे
 वजह यही कि 'दुआओं' में वो असर भी नहीं/

  अब हमें धोबी का कुत्ता कहें, गरीब कहें
 घाट तो है नहीं अपना तो कोई घर भी नहीं. --- नीलाम्बुज (ये कविता श्री हरिओम जी के ग़ज़ल संग्रह 'धूप का परचम' पढ़ते हुए लिखी थी जब मैं बी ए सेकेण्ड इयर में था.)

Sunday, May 23, 2010





प्रेमचंद को पढ़ते हुए 

लिखी लोरियां, उन्हें छपाया , खूब कमाया/हमने माँ की ममता का भी दाम लगाया.

खूब पढ़ी थी हमने भी पुस्तक में कविता/बाज़ारों से गुज़रे तो कुछ काम ना आया

अब तो 'पेप्सी', 'बर्गर', 'कोला' भले लगे हैं/माँ के हाथों की रोटी में स्वाद ना आया

आज 'अमीना' के हाथों को जलते देखा/ फिर भी मेरे मन में 'हामिद' क्यूँ ना आया



तुम बच्चों सा हँस देते हो, रो देते हो/ 'नील' अभी दुनियादारी का ढंग ना आया!

Tuesday, May 18, 2010



इश्क वालों में ये किस्सा ज़रा मशहूर रहा

जो दिल के पास रहा वो ही दूर दूर रहा.

जिसे समझे थे उनके प्यार की निशानी हम
वही लम्हा हमारी याद में नासूर रहा

हमें ग़ुरबत से ही अपनी कभी फुर्सत ना मिली 
वो था अमीर, इसी बात में मगरूर रहा

इश्क में हम तो खैर हो गए फना, वो भी 
ज़रा ज़रा सा परेशान तो ज़रूर रहा

खडा मकतल में, मेरी लाश पे , ले के खंज़र 
और कहता "बताओ क्या मेरा कुसूर रहा"


Sunday, May 16, 2010

ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे




ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे
वो उसी पर ज्यामिति अल्ज़ब्र हल करते रहे

देख कर काली घटाएँ हम ग़ज़ल कहते रहे
और वो- “बस होगी बारिश आज-कल” कहते रहे

नाम सीने पर लिखा उनको दिखाया जब गया
मुँह फिरा कर वो तो “इट इज़ हॉरिबल” कहते रहे

ले गए जब बोतलों मे अपने अश्क़ों को हुज़ूर
प्रश्नवाचक में वो “कोई केमिकल?” कहते रहे

इस मुहब्बत की सियासत के वो आली हैं जनाब
हम तो बस देखा किए, वो दल-बदल करते रहे

हम भी आख़िर आदमी हैं कोई बेजाँ बुत नहीं
छल छला जाएंगे ग़र वो यूँ ही छल करते रहे

Thursday, April 22, 2010

खूब दिलकश है ये अन्दाज बहुत


खूब दिलकश  है ये अन्दाज बहुत,
खामुशी कह रही है राज बहुत

उनको भी सू-ए-मैकदा देखा 
जो कि बनते थे पाकबाज़ बहुत 

अभी कुछ मर तो नहीं जायेंगे 
गो तबियत से हैं नासाज़ बहुत 

जहां में जाविदाँ* रखते हैं रकीब 
मत करो दोस्तों पे नाज़ बहुत 

अश्क, उम्मीद, बेवफाई, प्यार 
हैं अभी ज़िन्दगी के साज़ बहुत 

परिंदों और इंतज़ार करो 
अभी छोटी है ये परवाज़**बहुत 

*जाँविदा =अमर 
**परवाज़=उड़ान 



Thursday, September 24, 2009

पेट की आग को आंसू से बुझाया न करो






















पेट की आग को आंसू से बुझाया न करो
ये कतरे खून के हैं इनको यूं जाया न करो

अगर होता है ज़ुल्म-ओ-ज़ोर तो लड़ना सीखो
सिर कटाया न करो गरचे झुकाया न करो

फिजा यहाँ की सुना है बड़ी बारुदी है
बातों बातों में अग्निबान चलाया न करो

गिरे आंसू तो कई राज़ छलक जायेंगे
अपनी आंखों को सरे आम भिगाया न करो

लोग कहने लगें कि "आप तो गऊ हैं मियां"
करो वादे मगर इतने भी निभाया न करो

एक बस्ती है जहाँ पर सभी फ़रिश्ते हैं
तुम हो इंसान देखो उस तरफ़ जाया न करो
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Sunday, September 20, 2009

लिखा तो हमने भी लेकिन कलम में धार नहीं


लिखा तो हमने भी लेकिन कलम में धार नहीं
हुनर तो है मगर वो पेट की पुकार नहीं

विसाल-ओ-हिज्र की बातें उन्हें सुनते हैं
जिन्हें रोटी के सिवा कोई सरोकार नही

उन्हीं के दम से महकती है ये दुनिया सारी
उन्हीं को चैन से जीने का अख्तियार नहीं

उनकी सिसकी तो चीर देती है कलेजे को
मेरे अशआर मगर उतने धारदार नहीं

मगर वो आज भी हँसते हैं मुस्कुराते हैं
ये उनकी जीत है यारों ये उनकी हार नहीं

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...