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Sunday, August 3, 2025

सांवली लड़कियां



क्या तुमने देखा है  उषाकाल के आकाश को?
क्या खेतो में पानी पटाने पर मिट्टी का रंग देखा है?
शतरंज की मुहरें भी जहां पा जाती हैं बराबरी का हक़  
उस जम्बूद्वीप भारत में क्या तुमने
 किसी साँवली लड़की को 
देखा है कभी गौर से ?

उन्हें काजल की तरह आँखों में बसाया नहीं गया
कलंक की तरह ढोया गया 
शर्म की तरह ढाँपा गया 
बुरी नीयत की तरह छिपाया गया

उन्हें फेयरनेस क्रीम से लेकर 
सीमेंट की बोरी तक 
बेचा गया
काला सोना बताकर 
लूटा गया।

दीपशिखा नहीं 
उसकी कालिख समझा गया!

उन्हें कूटा गया 
काली मिर्च समझकर
 
उनके चेहरे की किताब पर 
लगाया गया मेकअप का कवर 

साँवली लड़कियां 
उग आती हैं बाजरे की कलगी की तरह 
पक जाती हैं गेंहू की बालियों सी 
छा जाती हैं रात की मानिंद
जल थल आकाश कर देती हैं एक
और अपने आगोश में समेट लेती हैं 
पूरी पृथ्वी को. 

उन्हें खोजना हो तो 
विज्ञापनों में नहीं 
देखना किसी लाइब्रेरी की चौखट पर 
या धान के खेत में बुवाई करते हुए 
या रुपहले पर्दों के पीछे 
नेपथ्य में । 

उन्हें ढूंढों 
उन कहानियों और कविताओं में 
जिन्हें कभी पढ़ा या गाया नहीं गया . 

वहांँ मिलेगी तुम्हें वह साँवली लड़की 
जिसकी आँखों में तुम्हें शायद दिखे 
उसके दर्द का वह उद्दाम आवेग 
जिसे उसकी मुस्कराहट के बाँध ने 
थाम रखा है .

चाय पीजिए

जब दिल में उठें वलवले तब चाय पीजिए
जब मन करे कि कुछ न करें ,चाय पीजिए। 

पूरब में हों तो नींबू वाली चाय पीजिए
पच्छिम में हों तो दूध वाली चाय पीजिए
उत्तर में भरे ग्लास वाली चाय पीजिए
दक्कन में यूं कॉफी के साथ चाय पीजिए
बंगाली हैं मोशाय तो खा जाइए उसे
गुजराती हैं तो फूंक कर रसपान कीजिए
 
राष्ट्रीय एकता है यही चाय पीजिए। 

क्रॉकरी में पिएं आप फ़क़त राष्ट्रवादी चाय 
'चीनी' मिला के पीजिए तो देशद्रोही चाय
गर ढारिये पलेट में तो लोकजीवी चाय
गोष्ठी में अगर पीजिए तो बुद्धिजीवी चाय

पड़ जाए पिलानी तो एक कप ही बहुत है
जो मुफ्त मिले बाल्टी भर चाय पीजिए। 

सर्दी में चाय पीजिए कंबल को ओढ़कर
गर्मी में चाय पीजिए हर बांध तोड़कर
बरसात हो तो साथ पकौड़ी के पीजिए
बारात हो तो साथ कचौड़ी के पीजिए

मौसम की कोई टोक नहीं रोक नहीं है
मिल जाए कोई यार तो बस चाय पीजिए। 

ऑडी में बैठकर के उसे आइस टी कहें 
बहुमंजिला इमारतों में ग्रीन टी कहें 
करते हैं अगर डायटिंग तो भी इसे पिएं 
राइटिंग करें या फाइटिंग हरगिज़ इसे पिएं 

इंसानियत का खून पीना हो गया बहुत 
इंसानियत के नाम आप चाय पीजिए।

नीलांबुज सरोज
21 मई, 2025
अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस

Monday, July 30, 2018

परकाया

डॉ कलाम!
अच्छा हुआ आप चले गए।
अच्छा हुआ आप हिन्दू ह्रदय सम्राटों के पैरों में बैठ गए
अच्छा हुआ आप साईँ बाबा और शंकराचार्यों के आशीर्वाद के ओट तले रहे
वरना अगर आप गए होते और किसी राह
तो कहलाए होते मुल्ला कलाम।
लगते आप पर कटुवा होने के कड़वे आरोप
और अरिंदम चौधरी टाइप के लोग नहीं बुलाते आपको।
डॉ कलाम!
आप वोट बैंक थे भले आप न मानें या न जानें।
भगत सिंह !
इस देश में तुम्हारी फ़ोटो लगाकर
तुम्हारे ज़मीर बेच देने वालों के बीच
कलाम और भला कैसे जीवित रहते?
मनुस्मृति के इस देश में
तुम गीता न बांचते तो कैसे जीवित रहते ?
त्रिशूल, फरसा, गदा, बरछी और भाला वाले भगवानों के देश में
मिसाइल बनाकर ही वैज्ञानिक हुआ जा सकता है कलाम!
माफ़ करना कलाम
तुम अगर वोट बैंक के प्रतीक न होते तो
तुम्हे भारत रत्न नहीं कोई चार्जशीट मिलती
कलाम!
तुमने देश के लिए बहुत कुछ किया
लेकिन देश को राष्ट्र बना दिया जाता है यहाँ
मुल्क़ और वतन की बात मत करो
वरना उठा कर फेंक दिए जाओगे धनुषकोटि


-30 जुलाई 2015
-नीलाम्बुज।
(तर्कपूर्ण  असहमतियों का विशेष स्वागत है)

Thursday, February 13, 2014

रेसिपी




मित्रों !
नहीं , नहीं , फ्रेंड्स !
आज हम बनाएँगे
हर दिल अज़ीज़
बेहद लज़ीज़
(ख़ास कर दिले-गरीब)
रोटी जली।
चाहिए कुछ चीज़ें भली।
भूख पहले
ऐसी कि जिससे दिल दहले
खाना ये बन रहा है चार का
आटा बेहतर होगा यदि हो
उधार का ।
अब जलाएँ
पेट नहीं, आग।
गरम कीजिये तवे को
न कि दिमाग।
कुछ देर भाग्य को बिसूरें
इसी बीच भगा दें उस कुत्ते को
जो है बड़ी देर से
मौके की तलाश में।
थोड़ी सी शर्म से गार्निश करें
फिर टुकुर टुकुर देखती आँखों
और कुलबुलाती आशाओं को सर्व करें
अपनी इस रेसिपी पर गर्व करें।

अप्रैल, 2002

( बनारस-बलिया पैसेंजर से उतरा तो पटरी के किनारे एक ऐसा ही दृश्य देख कर मन क्षुब्ध हो गया और घर पहुँचा तो टी वी पर रेसिपी का प्रोग्राम देखा जा रहा था। उसी की उपज है ये कविता। )

Monday, February 3, 2014

नीडो तानिया की याद में






मेरे मरहूम दोस्त 
तुम्हारे बालों का क्या रंग था ?

तुम्हारी बोलती सी आँखें मुझे सोने नहीं दे रहीं 
तुम्हारा चेहरा मिलता है मेरे किसी भाई से 
किसी पड़ोसी से 
मेरे किसी दोस्त से 
मेरे देश के किसी मेहनती किसान से 
किसी निरीह मजदूर से
मेरे देश के किसी भावी खिलाड़ी से
तुम्हें मार दिया गया !

देश साउथ एक्स में भी है
देश लाजपत नगर में भी है
देश लिट्रेचर फेस्टिवल और सिने शो में भी है थोड़ा थोड़ा
देश तो तवांग में भी होगा
देश तो होगा कछार में भी
देश तो त्रिपुरा के सिलाचरी बॉर्डर पर भी है
देश मस्त है, देश शर्मिंदा है, देश डरा हुआ है, देश क्षुब्ध है
कितना अलग है तुम्हारा और मेरा देश नीडो ?

मेरे ज़िंदा दोस्त !
तुम्हारे बालों का रंग कैसा भी था
तुम्हारे लहू का रंग तो लाल है न !
मेरे भी लहू का रंग लाल ही है।
देश का क्या रंग है ?
शर्मिंदगी का क्या रंग होता होगा ?

तुम्हारे सपने जब 2000 किलोमीटर से भी ज्यादा
दूरी तय करके गए थे राजधानी में
तो उनको पंख तक ठीक से न लग पाये थे
और तुम्हें बेदर्दी से मार दिया गया ।

धरने थे, रैलियाँ थीं , नारे थे
रिपोर्ट थी, एन जी ओ थे, थाने थे
नहीं थी तो इंसानियत
नहीं था तो वो जज़्बा
जो रंग को नहीं आत्मा को देख लेता है
मैं तुमको नहीं जानता दोस्त
लेकिन तुमको बहुत सारा जान गया हूँ अब
तुम्हारे बहाने थोड़ा सा जान गया हूँ खुद को
थोड़ा सा राजधानी को
थोड़ा सा रंग को
थोड़ा सा ख़ून को।

Friday, September 14, 2012

सामासिक संस्कृति


सभ्यता दाल-भात है !
स्वाद है संस्कृति?
केवल दाल-भात पेट तो भर देता है
लेकिन कभी-कभी एक अदद हरी मिर्च
(नमक के साथ)
स्वाद बढ़ा देती है
मिर्च कड़वी भी हो सकती है !
( फिर मीठी मिर्ची कभी सुनी भी तो नहीं !)
मिर्च कई तरह से खा सकते हैं –
हो सकता है बने चटनी
लोढ़े-सिलबट्टे पर ।
बन जाएगा आचार , यदि
भर दें उसमें थोड़ा सा मसाला और धन ।
 
यह बात भूख से निकली थी
और भूख संस्कृति नहीं होती
संस्कृति है स्वाद –
स्वाद : मेहनत का , पसीने का , खून का ।
इन्ही को समेट लो कवि !
सामासिक संस्कृति है यही , यही ।
 

Thursday, September 13, 2012

सर्वनाम


पुकारा तो हमेशा गया उसे
लेकिन वैसे ही जैसे
बेगार को बुलाया गया हो
दुखी के बजाय उसका बेटा
उपस्थित था वो हर रचना में
गुमनाम सा
जैसे
इंडिया गेट , विक्टोरिया पैलेस , गेटवे ऑफ़ इंडिया इत्यादि के
शिलापट्ट पर मजदूर!

जब भी सर्वनाम ने कुछ अपनी
सुनानी चाही
पाणिनि से पार्लियामेंट तक
सबकी भृकुटी तन गयी
इसलिए वैयाकरणों ने निष्कर्ष निकाला है-
सर्वनाम पर
बगावत के जुर्म में रा. सु. का. लगने वाला है.

Thursday, August 30, 2012

कागज़ी है पैराहन







आज प्यारी डायरी को लिखा फिर से,
खो गयी थी ये , ना जाने क्या हुआ था/
मिस किया था -
ये तो है बिल्कुल ही लाजिम./ आज फिर से 
रंग दिए पन्ने कई/ कुछ मज़ा आया.
मीत से जैसे मिले हों!
इन इशारों में ना जाने बात क्या है,
कागज़ी है पैराहन , अब क्या लिखें हम!!!

Thursday, August 2, 2012

अंतिम पंक्ति का शीर्षक




तर्जनी , मध्यमा, अनामिका
और यहाँ तक कि कनिष्ठा भी
पा जाती हैं मुझ से ज्यादा इज्ज़त
लेकिन द्रोणाचार्यों  के बीच तो
मैं ही लोकप्रिय हूँ.
मैं ओ के  हूँ
मैं चीयर्स हूँ
मैं शेम हूँ
मैं लिफ्ट हूँ , हूट हूँ
मैं लाइक और डिसलाइक का फ्रेम हूँ
और तो और मैं कोका  कोला का
प्रसिद्ध ब्रांड हूँ
मैं अपने आप में अनूठा हूँ
मैं अंगूठा हूँ

सरोज-स्मृति : निराला - व्याख्या जैसा कुछ


देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल। देखती मुझे तू हँसी मन्द, होंठो में बिजली फँसी स्पन्द उर में भर झूली छवि सुन्दर, प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर तू खुली एक उच्छवास संग, विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग, नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर। देखा मैनें वह मूर्ति-धीति मेरे वसन्त की प्रथम गीति -- श्रृंगार, रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग -- भरता प्राणों में राग-रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही। हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन कोई थे नहीं, न आमन्त्रण था भेजा गया, विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग; प्रिय मौन एक संगीत भरा नव जीवन के स्वर पर उतरा।



इस काव्यांश  में निराला ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह का वर्णन किया है.
‘आमूल’ का अर्थ ‘रेडिकल’ के ज्यादा नज़दीक है. नवल भी उसी नवाचार की प्रतिष्ठा करता है.  निराला ने अपनी पुत्री के विवाह में किसी वेदपाठी ब्राह्मण को नहीं बुलाया. ना तो जन्म-कुंडली मिलवाई. निराला वैसे भी बदनाम थे अपने समाज में. “ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत”.  कोई पंडित राज़ी नहीं था सरोज की शादी के लिए. तो निराला ने निर्णय लिया कि वह स्वयं ये ज़िम्मेदारी उठाएंगे. वे लिखते हैं - “ लग्न के पढूंगा स्वयं मन्त्र , यदि पंडित जी होंगे स्वतंत्र”.
सबसे बड़ी बात , शायद भारतीय भाषाओं के किसी भी साहित्य में किसी पिता ने अपनी पुत्री के सौंदर्य की तुलना अपनी पत्नी के सौंदर्य से नहीं की थी. ना कालिदास ने , ना व्यास ने , ना वाल्मीकि ने ,  ना भवभूति ने , ना कम्ब ने , ना वाणभट्ट आदि ने . यह काम शायद निराला को ही करना था.
सरोज की सुहागन वाली छवि निराला को बार बार मनोहर देवी की याद दिलाती है. जब कलश के जल से वधू को स्नान कराया गया , तो निराला को अपनी प्रिया यानी मनोहरा देवी की सबसे ज्यादा याद आई. क्यों ? क्योंकि यह काम परंपरागत रूप से लड़की की माँ ही करती है.  जब सरोज ने इस अवसर पर अपने पिता की तरफ हँसते हुए देखा तो अकस्मात ही निराला के ह्रदय में अपनी पत्नी की छवि उभर आई.
‘प्रिय की अशब्द श्रृंगार मुखर...” का अर्थ है कि मानो मनोहरा देवी का सौंदर्य ही सरोज के सहज उच्छ्वास के साथ साकार हो उठा हो . सरोज के अंग अंग से मनोहरा की कान्ति फूट रही है , यह इतना सहज है कि दोनों एकाकार हो उठे हैं. सरोज के अंग अंग से जो कान्ति निकल रही है , वह लगातार कवि को अपनी प्रियतमा की याद दिला रही है.
कवि एक फ्लैशबैक में चला जाता है. उसे अपनी प्रियतमा के संग बिताए गए क्षण याद आने लगते हैं. निराला को मनोहरा देवी का सौंदर्य और उनका मधुर गला याद आने लगता है. वो गीत जो उन्होंने अपनी पत्नी से सीखा था – “श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन हरण भव भय दारुणं”जिसने उनके प्राणों में नया उत्साह भर दिया था . ( ‘निराला की साहित्य साधना -१ : राम विलास शर्मा )

कवि कहता है कि सरोज का रूप देखकर ऐसा लगता है कि मानो कामदेव ने वही रूप आज मेरी बेटी को दे दिया है. “आकाश बदल कर बना मही”में ये ध्वनि है कि अगर मनोहरा का सौंदर्य आकाशधर्मा था , तो सरोज का सौंदर्य वसुधा-धर्मी. अर्थात मनोहरा में कल्पना की प्रधानता थे और सरोज में यथार्थ की.

बाकी पंक्तियाँ साधारण ही हैं. उसमें खास ये हैं कि निराला ने जो विवाह सरोज का किया , उसमें किसी रिश्तेदार आदि को न बुलाकर केवल आत्मीय स्वजनों को बुलाया. इसका विवरण भी ‘निराला की साहित्य साधना -१’ में दिया गया है.
अंतिम पंक्तियों में निराला लिखते हैं कि जिस घर में कुछ दिनों से दिन रात ‘विवाह राग’ बज रहा था , अचानक वह सूना हो गया . सूना भी वैसा नहीं, एक मौन संगीत जैसे कहीं बज रहा हो, और एक नए जीवन का स्वागत कर रहा हो .  आचार्य शुक्ल ने तो लिखा ही है कि – “कविता को संगीत के और संगीत को कविता के निकट लाने का जैसा प्रयास निराला ने किया है , वैसा किसी आधुनिक  हिंदी के कवि ने नहीं किया.” ( हिंदी साहित्य का इतिहास)


Tuesday, July 17, 2012

विकल्प





पेड़ से झूल रही रस्सी का
आप क्या बनाएँगे ?

बच्चों का झूला
या
फाँसी का फंदा ?

रासायनिक परिवर्तन


जब पहली बार
बैठा था वो 
'पिज्जा हट' में 
तो उसे याद आई थी 
चूल्हे की अधजली रोटी,

याद आई थी उसे 
अपनी टपकती हुई झोपडी
जब लिफ्ट से उसने 
पच्चीसवें माले पर कदम रखा था,

बूढ़े बॉस के चेहरे की 
लालिमा की तुलना
उसने जवान भाई के
मुरझाये हुए चेहरे से की थी,

शहर की चमचमाती सड़कों में 
उसे रह रह कर 
गाँव की गड्ढे वाली कच्ची सड़क
याद आई थी,

उसे जब पहली बार मिला 
कॉर्पोरेट कंपनी से
'पेमेंट' का चेक
तब उसे कुछ याद नहीं रहा...

अब वो खुश है !


प्रेयसी के लिए


(ये कविता डॉ॰ लक्ष्मी शर्मा  द्वारा संपादित 'लड़की होकर सवाल करती है' किताब में प्रकाशित हुई है । बोधि प्रकाशन से । वहाँ इसका शीर्षक 'स्त्री तुम चिड़िया हो' दिया गया है। यहाँ प्रकाशित कविता का चित्र और  मूल शीर्षक के साथ मूल कविता प्रस्तुत है। )


तुम चिड़िया हो या नदी 
फूल हो या वसंत 
तुम कागज़ हो या कलम
तुम संज्ञा हो या विशेषण 
नहीं जानता 
जानना चाहता भी नहीं 
बस चाहता हूँ 
कि तुम उड़ती रहो 
मेरे मानस-गगन में
तुम बहती रहो सदानीरा जैसी 
मेरे हृदय पटल पर 
तुम करती रहो सुरभित 
मेरी यादें । 

तुम्हें न लिख सकता हूँ 
और ना ही पढ़ सकता हूँ 
पर कर सकता हूँ महसूस
इतना - कि मानो तुम 
स्वयं को पहचानो 
मेरे स्पर्श से । 
मैं खोजना चाहता हूँ 
तुम्हारे अंदर -
स्वयं को । 
सच 
बस इतना ही चाहता हूँ , 
बस यही!

Monday, July 16, 2012

सर्वनाम


पुकारा तो हमेशा गया उसेलेकिन वैसे ही जैसे
बेगार को बुलाया गया हो
दुखी के बजाय उसका बेटा
उपस्थित था वो हर रचना में
गुमनाम सा
जैसे
इंडिया गेट , विक्टोरिया पैलेस , गेटवे ऑफ़ इंडिया 
इत्यादि के
शिलापट्ट पर मजदूर
जब भी सर्वनाम ने कुछ अपनी
सुनानी चाही
पाणिनि से पार्लियामेंट तक
सबकी भृकुटी तन गयी
इसलिए वैयाकरणों ने निष्कर्ष निकला है
सर्वनाम पर
बगावत के जुर्म में रा. सु. का. लगने वाला है.

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...