Saturday, August 18, 2012

अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!


अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!

2 NOVEMBER 2011 5 COMMENTS
♦ नीलांबुज

बैंगलोर का एक चेहरा यह भी है…
जब हम स्काउट कैंप, बंगलौर गये थे ट्रेनिंग के लिए, तो दस दिन की ट्रेनिंग में एक दिन दशहरे के नाम पर बाहर छोड़ा गया, शहर घूमने के लिए। सबसे कहा गया कि यात्रा का विवरण लिख कर लाना है। मेरे अंदर खलबली हुई और जो बाहर आया वो ये था…
ल हम लोग दशहरे वाले दिन बंगलौर घूमने निकले। मैं दोस्तों से थोड़ा पीछे रह गया तस्वीरें लेने के चक्कर में। तभी मुझे बंगलौर आता दिखाई दिया। गंदे-स्वच्छ कपड़ों की मिली-जुली पोशाक में। उदास, हताश, परेशान। मैंने पूछ – “क्या हुआ बंधु, राजधानी होकर भी खस्ता हाल? केंद्रीय विद्यालय में पढ़ाते हो क्या?”
वो बोला, “नहीं, अब इतना भी बुरा हाल नहीं है। लेकिन अच्छा भी नहीं है। लोग समझते हैं, मैं राजधानी हूं। ऐश-ओ-आराम से रह रहा होऊंगा। लेकिन मुझ पर जो बीतती है, मैं ही जानता हूं। हर रोज मेरे सीने पर सैकड़ों नयी गाड़ियां दौड़ा दी जाती हैं। माल, सड़क, कालोनी बनाने के बहाने मेरी हरियाली को नष्ट किया जा रहा है। ये जो मेरे साफ कपड़े हैं, वो तो मेरा वह हिस्सा है, जिसे मीडिया हमेशा दिखाता है। मेरा असली वेश तो मेरे फटे-पुराने कपड़े यानी वो गंदी बस्तियां हैं, जिनको कभी प्रगति की हवा भी नहीं लगी। रोज बेदखल हो रहे हैं ऐसे लोग मेनस्ट्रीम से। मेरे कुछ भाई-बहनों का हाल तो मुझसे भी बुरा है। कल दिल्ली बहन ने फोन किया था। वो भी कोमनवेल्थ के बाद सुंदरता की उम्मीद में थी, लेकिन क्या हुआ? आजकल मुझे भी मेट्रो नाम का झुनझुना देने की तैयारी है। हर जगह जो गड्ढे देख रहे हो, उसी का परिणाम है। चेन्नई-मुंबई बहन और कोलकाता भाई भी इन्‍हीं दिक्कतों से परेशान है। अहमदाबाद सर ने भी कुछ ऐसी ही बात ईमेल से भेजी थी।”
मैं हतप्रभ था! मैंने ऐसे ही कहा, “चलो बंगलौर भाई, चाय पीते हैं…”
बंगलौर ने कहा, “नहीं। चाय पीने की मुझे आदत नहीं है। पेट्रोल और डीजल का धुआं ही मेरा कलेवा है। कूड़े का लंच कर लेता हूं और डिनर भी वही।”
मुझे देर हो रही थी। सोचा कहां फस गया। इसकी तस्वीर उतार लूं क्या? शायद किसी एक्जिबिशन में पुरस्कार ही मिल जाए लेकिन ऐन उसी वक्‍त पर मेरे मोबाइल की बैटरी ने साथ छोड़ दिया।
बंगलौर ने आगे कहा, “नेताओं, मंत्रियों, अफसरों और टूरिस्टों को दिखाने के लिए मुझे सज-संवर कर रहना पड़ता है, वरना हालत बड़ी खराब है भाई।”
तभी एक लाल बत्ती वाली गाड़ी आती दिखी। बंगलौर ने अपनी कमीज का साफ-सुथरा वाला हिस्सा गाड़ी की तरफ कर दिया। मुझे लगा जैसे कह रहा हो, “अल्ट्रा मेट्रो सिटी बंगलौर रिपोर्टिंग सर!”

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