Monday, July 16, 2012
सच
कविता लिखना आसान है
समझाना उस से ज़रा ज्यादा मुश्किल
और जीना?
बहुत कठिन है साथी
कविता को जीना बहुत कठिन है!
Saturday, July 7, 2012
लापता
लापता
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कुछ पता नहीं चलता
शम्भूक के कटे हुए सिर का
छींटे तो पड़े होंगे रक्त के !
कहाँ हैं वो ?
क्या धो दिया गया उन्हें सोमरस से ?
या यज्ञ की वेदी के नीचे दबा दिया गया ?
क्या हुआ शबरी का
जूठन खिलाने के बाद ?
क्या राम ने दे दी उसे
वृद्धावस्था पेंशन ?
कहाँ दबी होगी उसकी फ़ाइल ?
और तो और
ना जाने कहाँ है
एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा भी ,
नहीं दीखता 'गुरु द्रोणाचार्य' वाले
मेट्रो स्टेशन पर भी
या द्रोणाचार्य की किसी तस्वीर में ?
कहाँ गए ऐसे लोग ?
कहाँ गयी उनकी स्मृतियाँ ?
ठहरो !
धरती हिल रही है
और
पाताल तोड़ कर कोई
निकल रहा है बाहर !!!
Tuesday, August 30, 2011
गए दिनों की यादें थीं
गए दिनों की यादें थीं
बिन बादल बरसातें थीं
सूना सूना आंगन था
गीली गीली ऑंखें थीं
एक मेरा दिल तनहा था
तरह तरह की बातें थीं
कभी कभी गठबंधन था
कभी कभी सरकारें थीं
पेट मेरा जब 'फुलफिल' था
चारो ओर बहारें थीं
पाखंडों का बिल्डर था
मखमल की दीवारें थीं
तेरे पास ज़माना था
मेरे पास किताबें थीं
बिन बादल बरसातें थीं
सूना सूना आंगन था
गीली गीली ऑंखें थीं
एक मेरा दिल तनहा था
तरह तरह की बातें थीं
कभी कभी गठबंधन था
कभी कभी सरकारें थीं
पेट मेरा जब 'फुलफिल' था
चारो ओर बहारें थीं
पाखंडों का बिल्डर था
मखमल की दीवारें थीं
तेरे पास ज़माना था
मेरे पास किताबें थीं
Monday, August 1, 2011
प्रेमचंद जयंती: केरल में
केरल
एक सुंदर जगह है। यहां के वायनाड जिले में केंद्रीय विद्यालय, कल्पेट्टा
के राजभाषा विभाग के बैनर तले एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी
प्रेमचंद जयंती की पूर्व-संध्या पर हुई। विषय था, प्रेमचंद और बाल
मनोविज्ञान। हर्ष की बात है कि केरल के आदिवासी बहुल इस इलाके में प्रेमचंद
को जानने, समझने और चाहने वाले खूब लोग हैं। यद्यपि यह एक सरकारी
कार्यक्रम था, इसका तेवर जनोन्मुख था। राजभाषा की जटिलताओं से दूर बच्चों
के प्यारे लेखक प्रेमचंद की सरल भाषा वाली रचनाएं थीं। बच्चों के बनाये गये
पोस्टर थे, उनकी सहभागिता थी। वक्ताओं में डॉ सिंधु (एर्नाकुलम
विश्वविद्यालय, एर्नाकुलम) और डॉ मिनी प्रिया (सेंट थोमस कॉलेज, त्रिशूर)
ने अपने विचार व्यक्त किये।
डॉ सिंधु ने प्रेमचंद के जीवन से जुडी बारीक बातों को बच्चों के सामने सरल ढंग से पेश किया। उनके कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों ने पूस की रात कहानी का मलयालम अनुवाद किया था, जिसे हमारे विद्यालय की दसवीं कक्षा की एक छात्रा अंजू सी ने प्रस्तुत किया। इस RECREATION में केरल की संस्कृति के अनुरूप ही बदलाव कर दिये गये थे। इस प्रयास को बच्चों ने खूब पसंद किया। इसके अलावा सिंधु जी ने प्रेमचंद के जीवन से जुडी यादगार तस्वीरों को कंप्यूटर के जरिये प्रस्तुत किया। उन्होंने बच्चों से प्रेमचंद की ही तरह साधारण किंतु महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखने की अपील भी की।
डॉ मिनी प्रिया जी ने अपने सारगर्भित भाषण में प्रेमचंद के साहित्य को आजादी के बाद के परिवेश में समझने पर बल दिया। उन्होंने हरिशंकर परसाई की एक रचना से उद्धृत एक प्रसंग का उल्लेख किया। एक बच्चे द्वारा स्वतंत्रता के बुनियादी अर्थ पर ही सवाल उठाया जाता है, जब उसे घर में ही परिवार द्वारा अनेक गुलामियां सहन करनी पड़ती हैं। प्रेमचंद ऐसे ही बच्चों के कलाकार थे। प्रेमचंद बच्चों ही नहीं, बचपन को बचाने पर बल देते हैं, ऐसी बातें मिनी प्रिया जी के भाषण से निकल कर सामने आयीं। उन्होंने विद्यालय के बच्चों के योगदान की भी सराहना की और कहा कि ऐसे ही बच्चे प्रेमचंद की संवेदना का विषय थे।
कार्यक्रम में जिन बच्चों ने सहभागिता की उनमें से कुछ हैं… श्रीजिता, श्रेयस, हरिता, अंजलि जो जेम्स, अक्षय किशन, उन्नी कृष्णन, ब्लेसन, जोन, श्रद्धेय, आर्या, श्रेया, अक्षय, रिशिका, एबिन जकारिया, अश्वती और जिना थोमस।
कार्यक्रम में श्रद्धा, सुष्मिता मेरी रोबिन्सन, श्रीमती मिनी, विजेंद्र कुमार मीना और अश्वती ने सक्रिय योगदान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्या केजी सुजया ने हिंदी के इस कार्यक्रम के लिए अतिथियों को बधाई दी और हिंदी के प्रोत्साहन के लिए अपनी प्रतिबद्धता जतायी।
कार्यक्रम का संचालन नीलांबुज ने किया।
PGT (HINDI)
C/O RAJBHASHA VIBHAG,
KENDRIYA VIDYALAY, KALPETTA-673121
DIST – WAYANAD, KERALA
Email thenilambuj@gmail.com
Phone 09895853826
Blog http://nilambujciljnu.blogspot.in/
डॉ सिंधु ने प्रेमचंद के जीवन से जुडी बारीक बातों को बच्चों के सामने सरल ढंग से पेश किया। उनके कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों ने पूस की रात कहानी का मलयालम अनुवाद किया था, जिसे हमारे विद्यालय की दसवीं कक्षा की एक छात्रा अंजू सी ने प्रस्तुत किया। इस RECREATION में केरल की संस्कृति के अनुरूप ही बदलाव कर दिये गये थे। इस प्रयास को बच्चों ने खूब पसंद किया। इसके अलावा सिंधु जी ने प्रेमचंद के जीवन से जुडी यादगार तस्वीरों को कंप्यूटर के जरिये प्रस्तुत किया। उन्होंने बच्चों से प्रेमचंद की ही तरह साधारण किंतु महत्वपूर्ण मुद्दों पर लिखने की अपील भी की।
डॉ मिनी प्रिया जी ने अपने सारगर्भित भाषण में प्रेमचंद के साहित्य को आजादी के बाद के परिवेश में समझने पर बल दिया। उन्होंने हरिशंकर परसाई की एक रचना से उद्धृत एक प्रसंग का उल्लेख किया। एक बच्चे द्वारा स्वतंत्रता के बुनियादी अर्थ पर ही सवाल उठाया जाता है, जब उसे घर में ही परिवार द्वारा अनेक गुलामियां सहन करनी पड़ती हैं। प्रेमचंद ऐसे ही बच्चों के कलाकार थे। प्रेमचंद बच्चों ही नहीं, बचपन को बचाने पर बल देते हैं, ऐसी बातें मिनी प्रिया जी के भाषण से निकल कर सामने आयीं। उन्होंने विद्यालय के बच्चों के योगदान की भी सराहना की और कहा कि ऐसे ही बच्चे प्रेमचंद की संवेदना का विषय थे।
कार्यक्रम में जिन बच्चों ने सहभागिता की उनमें से कुछ हैं… श्रीजिता, श्रेयस, हरिता, अंजलि जो जेम्स, अक्षय किशन, उन्नी कृष्णन, ब्लेसन, जोन, श्रद्धेय, आर्या, श्रेया, अक्षय, रिशिका, एबिन जकारिया, अश्वती और जिना थोमस।
कार्यक्रम में श्रद्धा, सुष्मिता मेरी रोबिन्सन, श्रीमती मिनी, विजेंद्र कुमार मीना और अश्वती ने सक्रिय योगदान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्या केजी सुजया ने हिंदी के इस कार्यक्रम के लिए अतिथियों को बधाई दी और हिंदी के प्रोत्साहन के लिए अपनी प्रतिबद्धता जतायी।
कार्यक्रम का संचालन नीलांबुज ने किया।
नोट : इस कार्यक्रम में कुछ लोगों ने अपने शोध पत्र भी भेजे थे, जो स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा पढ़े गये। उनमें डॉ संजय कुमार, सुषमा कुमारी, और अमिष वर्मा उल्लेखनीय हैं। गौतलब है कि केंद्रीय विद्यालय कल्पेट्टा ऐसे शोध पत्रों का स्वागत करता है, जो प्रेमचंद और बाल मनोविज्ञान विषय पर हों। इनका संकलन करके इन्हें एक किताब की शक्ल में छापने की योजना है। इस पुस्तक का लोकार्पण हिंदी दिवस के अवसर पर किया जाएगा। अतः सुधी जनों से शोध पत्र आमंत्रित हैं। अंतिम तिथि 31 अगस्त, 2011 रखी गयी है। शोध-पत्र इस पते पर भेज सकते हैं…NILAMBUJ SINGH
PGT (HINDI)
C/O RAJBHASHA VIBHAG,
KENDRIYA VIDYALAY, KALPETTA-673121
DIST – WAYANAD, KERALA
Email thenilambuj@gmail.com
Phone 09895853826
Blog http://nilambujciljnu.blogspot.in/
Monday, July 11, 2011
खुद से अपने ही राज़दार हुए
खुद से अपने ही राज़दार हुए
इस तरह हम भी समझदार हुए
इस तरह हम भी समझदार हुए
सच कहा तो कोई नहीं माना
झूठ बोला सभी गुलज़ार हुए
बज़्म में खूब वाह वाह मिली
अपनी नज़रों में शर्मसार हुए--- नीलाम्बुज
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Thursday, August 5, 2010
बलिया में पुस्तकालय
लाइब्रेरी यानी पुस्तकालय एक किताबें रखने और पढ़ाने वाली संस्था से कुछ ज्यादा हुआ करती है. यह एक जीवन है और इस जीवन को जीने वाले हैं पुस्तक-प्रेमी लोग. लेकिन आज की चकाचौंध भरी जीवनशैली ने लोगों को खुद से ही काट कर रख दिया है. पूँजीवाद अकेलापन उत्पन्न करता है , ये तो कई विचारक कह गए है पहले ही , लेकिन आज कल तो लोग दूसरों से नही खुद से पराए हो गए लगते हैं. ऐसे माहौल मे किताबें अगर साथ हों तो सुकून देती हैं. एक कवि ने तो कहा है की अकेलेपन में एक किताब ही सबसे अच्छी दोस्त होती है. तो इस उपभोक्तावादी समय में एक पुस्तकालय का अपना अलग ही महत्व है.
मैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का एक विद्यार्थी हूँ. बी ए तक की शिक्षा वहीं से ली है मैने. बलिया कोई बहुत बडा शहर नही है. शहर की चौहद्दी तो इतनी छोटी है की अगर आप सायकिल से निकालिए तो २० मिनट में शहर का चक्कर लगा कर आ जाएंगे. इसी जिले ने साहित्य को हजारी प्रसाद द्विवेदी, केदारनाथ सिंह और अमरकान्त जैसे आलोचक, कवि और कथाकार दिए. जगदीश'सुन्दर' जैसे गीतकार दिए और राजनीति के कई योद्धा दिए. और उसी बलिया शहर में आज लोगों ने पुस्तकालयों की तरफ से मुह मोड-सा लिया है. यह विडम्बना ही कही जा सकती है.
इस शहर में कम से कम दो ऐसे पुस्तकालय हैं जो एक आम पाठक को लाभान्वित कर सकते हैं. दिक्कत ये है कि इन् दोनो पुस्तकालयों का कोई प्रचार तन्त्र नही है. एक तो राजकीय पुस्तकालय है जो चौक में कासिम बाजार के निकट जी आई सी के गेट से लगा हुआ है. दूसरा भी चौक में ही टाउन हाल में है जिसे हिन्दी प्रचारिणी सभा चलाती है. राजकीय पुस्तकालय सरकारी है तो जाहिर है यहाँ पुस्तकों की संख्या और आगत अधिक है. साहित्य, समाजशास्त्र , राजनीति , इतिहास, विज्ञान , खेल और प्रतियोगी परिक्षाओ के लिए उपयोगी किताबों का यहाँ अच्छा संग्रह है. इसका सदस्यता शुल्क भी महज ३५० रुपये है. वो भी आजीवन. लेकिन बलिया की युवा पीढी में इसके प्रति उदासीनता है. चन्द बुद्धिजिवियों और कुछ ज्ञान-प्रेमी युवाओं के अलावा यहाँ कोई नही आता. नयी पीढी जितना ध्यान बाज़रों मे नए तरह के कपडों और जूतों पर देती है उसका एक चौथाई भी इधर नही देती और तुर्रा ये कि हमें तो पढ्ने की जगह ही नही मिलती ! मुख्य बाजार से पुस्तकालय बिल्कुल लगा हुआ है लेकिन कोई भी वहाँ तक जाने कि ज़हमत नही उठाता. कहते हैं कि " हमरा त् कोरसे के कितबिया से फुर्सत नईखे, लाइब्रेरी के जाओ" (हमें तो कोर्स कि ही किताबें पढ्ने से फुर्सत नही है , अब लाइब्रेरी कौन जाए.) जबकि ऐसे लोग अगर यदा कदा पढ़ते भी दिख जाएँ तो दुहाई है !
हजारी प्रसाद द्विवेदी के बलिया मे सारे युवा ऐसे ही नही हैं. कुछ लोग अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल निकाल कर वहाँ चले ही जाते हैं. लेखक ने एक बार एक दिहाड़ी मजदूर को वहाँ पढ़ते देखा है. दिन में मेहनत करने के बाद शाम को वह अखबार पढ्ने आया करता था. उसका नाम शायद भूल गया हूँ लेकिन ऐसे ही लोग बलिया की विरासत के सही हकदार हैं.
पुस्तकालय का भवन है तो छोटा ही लेकिन २० व्यक्तियों के बैठने के लिए काफी है. प्रकाश की व्यवस्था हालाँकि बहुत अच्छी नही है. पुस्तकालय के कर्मचारी और अधिकारी भी काफी मदद करते हैं शोधर्थियों और जिज्ञासुओं की. किताबों के रख रखाव की व्यवस्था भी और सुधारी जा सकती है. लेकिन असली ज़रूरत है युवा वर्ग को इस तरफ आकर्षित करने की.
हिन्दी प्रचारिणी सभा का पुस्तकालय सार्वजनिक तो नही है लेकिन यहाँ पांडुलिपियों का काफी अच्छा संग्रह है. यहाँ से शोध के लिए किताबें मिल जाती हैं. ज़रुरत है इस सुविधा को हर खासो-आम तक पहुँचाने की.
बलिया रेलवे स्टेशन के पास सरस्वती पुस्तक केंद्र चलाने वाले श्री राजेंद्र प्रसाद इस दिशा में एक अच्छा प्रयास कर रहे हैं. अपनी दुकान पर आने वाले हर ग्राहक को वो पुस्तकालयों में जाने के लिए प्रेरित करते हैं. यह जानते हुए भी की इस बात का उनके व्यवसाय पर भी असर पड़ सकता है. लेकिन यही तो है बलिया की धरती का असर जो अगर सही ढंग से हो तो श्रीराम वर्मा को "अमरकांत" बना देती है !
इस धरती पर पुस्तकालयों के प्रेमियों की कमी नहीं होनी चाहिए. उम्मीद तो यही है और उम्मीद एक जिंदा शब्द है!
नीलाम्बुज सिंह.
भारतीय भाषा केंद्र
जे एन यू , नयी दिल्ली
मोबाईल - 09968519160
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