Tuesday, May 25, 2010







हमारे सफ़र का तो कोई हमसफ़र भी नहीं
 हमारे रास्तों का कोई रहगुज़र भी नहीं /

 हमें तो फ़िक्र है जनाब कल की रोटी की
वो रात हादसे में क्या हुआ खबर भी नहीं/

  भला बाजारों के दस्तूर कैसे सीखें हम
हमारे गाँव के नज़दीक तो शहर भी नहीं/

  न कभी 'धर्म' रहे और न कभी 'जात' रहे
 वजह यही कि 'दुआओं' में वो असर भी नहीं/

  अब हमें धोबी का कुत्ता कहें, गरीब कहें
 घाट तो है नहीं अपना तो कोई घर भी नहीं. --- नीलाम्बुज (ये कविता श्री हरिओम जी के ग़ज़ल संग्रह 'धूप का परचम' पढ़ते हुए लिखी थी जब मैं बी ए सेकेण्ड इयर में था.)

Sunday, May 23, 2010





प्रेमचंद को पढ़ते हुए 

लिखी लोरियां, उन्हें छपाया , खूब कमाया/हमने माँ की ममता का भी दाम लगाया.

खूब पढ़ी थी हमने भी पुस्तक में कविता/बाज़ारों से गुज़रे तो कुछ काम ना आया

अब तो 'पेप्सी', 'बर्गर', 'कोला' भले लगे हैं/माँ के हाथों की रोटी में स्वाद ना आया

आज 'अमीना' के हाथों को जलते देखा/ फिर भी मेरे मन में 'हामिद' क्यूँ ना आया



तुम बच्चों सा हँस देते हो, रो देते हो/ 'नील' अभी दुनियादारी का ढंग ना आया!

Tuesday, May 18, 2010



इश्क वालों में ये किस्सा ज़रा मशहूर रहा

जो दिल के पास रहा वो ही दूर दूर रहा.

जिसे समझे थे उनके प्यार की निशानी हम
वही लम्हा हमारी याद में नासूर रहा

हमें ग़ुरबत से ही अपनी कभी फुर्सत ना मिली 
वो था अमीर, इसी बात में मगरूर रहा

इश्क में हम तो खैर हो गए फना, वो भी 
ज़रा ज़रा सा परेशान तो ज़रूर रहा

खडा मकतल में, मेरी लाश पे , ले के खंज़र 
और कहता "बताओ क्या मेरा कुसूर रहा"


Sunday, May 16, 2010

ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे




ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे
वो उसी पर ज्यामिति अल्ज़ब्र हल करते रहे

देख कर काली घटाएँ हम ग़ज़ल कहते रहे
और वो- “बस होगी बारिश आज-कल” कहते रहे

नाम सीने पर लिखा उनको दिखाया जब गया
मुँह फिरा कर वो तो “इट इज़ हॉरिबल” कहते रहे

ले गए जब बोतलों मे अपने अश्क़ों को हुज़ूर
प्रश्नवाचक में वो “कोई केमिकल?” कहते रहे

इस मुहब्बत की सियासत के वो आली हैं जनाब
हम तो बस देखा किए, वो दल-बदल करते रहे

हम भी आख़िर आदमी हैं कोई बेजाँ बुत नहीं
छल छला जाएंगे ग़र वो यूँ ही छल करते रहे

ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए

  ज़ीस्त के दर्द से बेदार हुए इस तरह हम भी समझदार हुए زیست کے درد سے بیدار ہوئے اس طرح ہم بھی سمجھدار ہوئے सच कहा तो कोई नहीं माना झूठ बोला ...