Thursday, July 22, 2010
Monday, July 19, 2010
उंगलियाँ बन गयीं जुबां अब तो...
उंगलियाँ बन गयीं जुबां अब तो ,
बेकली हो चली रवां अब तो
ये बहारें भी जिनसे रश्क करें
ऐसी आयी है ये खिज़ां अब तो
सच कहीं दू......र जा के बैठ गया
इतने हैं झूठ दर्मयाँ अब तो
हाल किससे कहा करे कोई
पत्ता, बूटा न गुलिस्ताँ अब तो
तुम तो जज़्बात ले के बैठ गए
वक़्त होगा ही रायगाँ अब तो
बात कुछ कायदे की की जाए
कर चुके उनको परेशां अब तो
Tuesday, May 25, 2010
हमारे सफ़र का तो कोई हमसफ़र भी नहीं
हमारे रास्तों का कोई रहगुज़र भी नहीं /
हमें तो फ़िक्र है जनाब कल की रोटी की
वो रात हादसे में क्या हुआ खबर भी नहीं/
भला बाजारों के दस्तूर कैसे सीखें हम
हमारे गाँव के नज़दीक तो शहर भी नहीं/
न कभी 'धर्म' रहे और न कभी 'जात' रहे
वजह यही कि 'दुआओं' में वो असर भी नहीं/
अब हमें धोबी का कुत्ता कहें, गरीब कहें
घाट तो है नहीं अपना तो कोई घर भी नहीं. --- नीलाम्बुज (ये कविता श्री हरिओम जी के ग़ज़ल संग्रह 'धूप का परचम' पढ़ते हुए लिखी थी जब मैं बी ए सेकेण्ड इयर में था.)
Sunday, May 23, 2010
प्रेमचंद को पढ़ते हुए
प्रेमचंद को पढ़ते हुए
लिखी लोरियां, उन्हें छपाया , खूब कमाया/हमने माँ की ममता का भी दाम लगाया.
खूब पढ़ी थी हमने भी पुस्तक में कविता/बाज़ारों से गुज़रे तो कुछ काम ना आया
अब तो 'पेप्सी', 'बर्गर', 'कोला' भले लगे हैं/माँ के हाथों की रोटी में स्वाद ना आया
आज 'अमीना' के हाथों को जलते देखा/ फिर भी मेरे मन में 'हामिद' क्यूँ ना आया
तुम बच्चों सा हँस देते हो, रो देते हो/ 'नील' अभी दुनियादारी का ढंग ना आया!
खूब पढ़ी थी हमने भी पुस्तक में कविता/बाज़ारों से गुज़रे तो कुछ काम ना आया
अब तो 'पेप्सी', 'बर्गर', 'कोला' भले लगे हैं/माँ के हाथों की रोटी में स्वाद ना आया
आज 'अमीना' के हाथों को जलते देखा/ फिर भी मेरे मन में 'हामिद' क्यूँ ना आया
तुम बच्चों सा हँस देते हो, रो देते हो/ 'नील' अभी दुनियादारी का ढंग ना आया!
Tuesday, May 18, 2010
इश्क वालों में ये किस्सा ज़रा मशहूर रहा
जो दिल के पास रहा वो ही दूर दूर रहा.
जिसे समझे थे उनके प्यार की निशानी हम
वही लम्हा हमारी याद में नासूर रहा
हमें ग़ुरबत से ही अपनी कभी फुर्सत ना मिली
वो था अमीर, इसी बात में मगरूर रहा
इश्क में हम तो खैर हो गए फना, वो भी
ज़रा ज़रा सा परेशान तो ज़रूर रहा
खडा मकतल में, मेरी लाश पे , ले के खंज़र
और कहता "बताओ क्या मेरा कुसूर रहा"
Sunday, May 16, 2010
ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे
ख़त मुहब्बत के जो ख़ून-ओ-अश्क़ से लिखते रहे
वो उसी पर ज्यामिति अल्ज़ब्र हल करते रहे
देख कर काली घटाएँ हम ग़ज़ल कहते रहे
और वो- “बस होगी बारिश आज-कल” कहते रहे
नाम सीने पर लिखा उनको दिखाया जब गया
मुँह फिरा कर वो तो “इट इज़ हॉरिबल” कहते रहे
ले गए जब बोतलों मे अपने अश्क़ों को हुज़ूर
प्रश्नवाचक में वो “कोई केमिकल?” कहते रहे
इस मुहब्बत की सियासत के वो आली हैं जनाब
हम तो बस देखा किए, वो दल-बदल करते रहे
हम भी आख़िर आदमी हैं कोई बेजाँ बुत नहीं
छल छला जाएंगे ग़र वो यूँ ही छल करते रहे
Thursday, April 22, 2010
खूब दिलकश है ये अन्दाज बहुत
खूब दिलकश है ये अन्दाज बहुत,
खामुशी कह रही है राज बहुत
उनको भी सू-ए-मैकदा देखा
जो कि बनते थे पाकबाज़ बहुत
अभी कुछ मर तो नहीं जायेंगे
गो तबियत से हैं नासाज़ बहुत
जहां में जाविदाँ* रखते हैं रकीब
मत करो दोस्तों पे नाज़ बहुत
अश्क, उम्मीद, बेवफाई, प्यार
हैं अभी ज़िन्दगी के साज़ बहुत
परिंदों और इंतज़ार करो
अभी छोटी है ये परवाज़**बहुत
*जाँविदा =अमर
**परवाज़=उड़ान
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